मध्य प्रदेश में चाहे बीजेपी हारे या कांग्रेस संघ की जीत तय

22 नवंबर 2023
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो अब बीजेपी में हैं, 29 अक्टूबर 2018 को उज्जैन के एक मंदिर में पूजा करते हुए। मध्य प्रदेश में पार्टी ने एकमात्र रास्ता यह लिया है कि वह भगवा पार्टी की तरह बनकर बीजेपी से मुकाबला करेगी.
मुजीब फारूकी/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो अब बीजेपी में हैं, 29 अक्टूबर 2018 को उज्जैन के एक मंदिर में पूजा करते हुए। मध्य प्रदेश में पार्टी ने एकमात्र रास्ता यह लिया है कि वह भगवा पार्टी की तरह बनकर बीजेपी से मुकाबला करेगी.
मुजीब फारूकी/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पूरे चुनावी अभियान के दौरान पार्टी एक जरूरी बुनियादी सवाल को हल करने में नाकाम रही. एक ऐसा सवाल जिसका जवाब वह राष्ट्रीय स्तर पर भी देने में असमर्थ रही है. भारतीय जनता पार्टी की सफलता कांग्रेस की विफलताओं, उसके समझौतों और उसके पाखंड का नतीजा थी. क्या पार्टी ने लगातार हार से कुछ सीखा है? अगर वह सत्ता में आई तो क्या अलग करने का लक्ष्य रखेगी?

मध्य प्रदेश में पार्टी ने एकमात्र जवाब यह दिया है कि वह भगवा पार्टी की तरह बन कर बीजेपी से मुकाबला करेगी. मैं 2000 के दशक में राज्य में पत्रकार था. मैंने 2003 के चुनावों को कवर किया था जिसमें उमा भारती ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हराया था. तब से कांग्रेस पार्टी ने कमोबेश यही एकमात्र रणनीति अपनाई है.

2003 में, कांग्रेस नेतृत्व में सिंह, जो एक राजपूत हैं, और कमल नाथ, जो एक बनिया हैं, शामिल थे. वे अब भी हैं लेकिन उन्होंने भूमिकाओं की अदला-बदली कर ली​ है. दो बड़े नेताओं की बदौलत पार्टी के विकास में आई यह रुकावट अनिवार्य रूप से केंद्र की ही स्थिति को दोहराती है. राष्ट्रीय स्तर पर गांधी परिवार की मौजूदगी के चलते 1980 के दशक की शुरुआत से पार्टी में अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह और वाईएस राजशेखर रेड्डी जैसे जमीनी नेताओं का उभरा रुक गया है. अब पार्टी में ऐसा नहीं हैं जो अपने दम पर ऊपर उठे हों. इससे पार्टी बदलती हकीकत को समझ पाने में नाकामयाब है.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की विफलताओं की कहानी, शायद उसकी राष्ट्रीय विफलता का सबसे अच्छा सारांश है. इसकी शुरुआत अपनी ताकतों को विकसित करने में विफलता से होती है और बीजेपी के विचार के आगे आत्मसमर्पण के साथ खत्म होती है.

अगर हम नर्मदा के मार्ग को राज्य से होकर गुजरने वाली रेखा के रूप में मानें, तो जैसे-जैसे हम उत्तर की ओर उत्तरपश्चिम में चंबल या उत्तरपूर्व में उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ते हैं, दलित आबादी की सघनता लगातार बढ़ती जाती है जो कुल आबादी का लगभग 17 फीसदी है. 1990 के दशक में कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी ने उस वोट में काफी सेंध लगाना शुरू कर दिया था जिसे कांग्रेस अपना ही मानती रही थी. इस बढ़ते दबाव के चलते कांग्रेस सरकार को 2002 में भोपाल घोषणा के हिस्से के रूप में एक दलित एजेंडा तैयार करना पड़ा. इसके अलावा दिग्विजय सरकार ने चरनोई योजना शुरू की, जो भूमिहीन दलितों और आदिवासियों के बीच गांव की चरागाह भूमि को पुनर्वितरित करने का एक कदम था. यह हिंदी क्षेत्र में भूमि पुनर्वितरण कार्यक्रम का एकमात्र हालिया उदाहरण है.

हरतोष सिंह बल कारवां के कार्यकारी संपादक और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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