हिंदुत्व के आगे झुक कर नहीं हिंदू समाज में सुधार ला कर मजबूत होगा भारतीय लोकतंत्र

10 फ़रवरी 2024
22 अक्टूबर 2023 को पटना में गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देवी दुर्गा की पूजा करते हुए.
संतोष कुमार/हिंदुस्तान टाइम्स
22 अक्टूबर 2023 को पटना में गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देवी दुर्गा की पूजा करते हुए.
संतोष कुमार/हिंदुस्तान टाइम्स

वह 22 जनवरी थी. पास के बजरंग बली के मंदिर को शूद्र बनियों ने फूल मालाओं से सजाया था. पांच ब्राह्मण को बुला कर वे हवन करवाने वाले थे. परसों ही उन्होंने मंदिर को पीने के साफ पानी से पाइप लगा कर धोया था क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से आह्वान किया था कि वे अपने आस-पास के मंदिरों को धोएं. मंदिर के बाहर बड़े-बड़े साउंड बॉक्स भी रखे थे जिनमें जोर-जोर से "राम आएंगे" गाने लगातार बज रहे थे. लगभग 200 गज तक सड़क झंडी-पताका से सजी पड़ी थी. जब मैं अपनी पांच किलोमीटर की मॉर्निंग वॉक पर आगे निकला, तो पता चला शहर के सभी मंदिरों का यही हाल था. सिर्फ मंदिर ही नहीं शहर के सबसे मशहूर स्कूल, आरपीएस, में भी बच्चे अपनी सुबह की असेंबली में "राम आएंगे" गा रहे थे. 1990 के आखिरी दशक में मेरी स्कूलिंग यहीं से हुई थी. तब सुबह की असेंबली में हम छात्र भारत की प्रस्तावना "हम भारत के लोग" गाते थे.

असल में मौका था अयोध्या के नए मंदिर में राम की प्रतिमा स्थापित करने का, जिसे राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने "प्राण प्रतिष्ठा" का नाम दिया था. ट्रस्ट ने मंदिर पिछले तीन साल में बनवाया है. इसी जगह पर पहले सोलहवीं सदी की बाबरी मस्जिद हुआ करती थी और इसके आस-पास लगभग आधा दर्जन पौराणिक हिंदू मंदिर भी. मगर ट्रस्ट ने उन सबको हटवा कर पूरे 3 एकड़ में मंदिर बनवाया, जबकि मंदिर परिसर लगभग 70 एकड़ में. ब्राह्मण पुजारीगण प्राण-प्रतिष्ठा को मोदी के हाथों करवाने वाले थे. वैसा सोचा जाए तो अटपटा लगेगा कि आखिर कोई इंसान भगवान में प्राण को कैसे प्रतिष्ठित कर सकता है. भगवान तो इंसानो में जान फूंकते हैं, कोई उनमें कैसे जान फूंक सकता है. मगर आज के भारत में ऐसा सोचने वाले कितने हैं यह एक अलग सवाल है.

बहरहाल, बिहार शरीफ में दोपहर होते ही मंदिरों में हवन शुरू हो गया था. अगर आप इस वक्त इस शहर के किसी घर की छत पर खड़े हो जाते तो हर दिशा से जय श्रीराम के नारे सुनाई देते. लोगों ने अपने छतों पर नया भगवा झंडा भी लगाया था. जिनमें राम और अयोध्या में बनी मंदिर का तस्वीरें थीं. जैसा कि प्रधानमंत्री ने एक अपील में कहा था, शाम होते ही हर जाति के हिंदुओं ने अपने घरों में दिए जलाए, बच्चों ने पटाखे भी फोड़े और जय श्रीराम के नारे दिन भर लगाए. मोदी के अयोध्या में दिए जा रहे भाषण को बड़े-बड़े साउंड बॉक्स पर सुनाया गया. 

बिहार शरीफ बिहार के नालंदा जिले का एक छोटा सा शहर है जिसकी आबादी लगभग 4 लाख है. यह बिहार के मुख्यमंत्री का संसदीय क्षेत्र भी रहा है जब वह केंद्र में मंत्री थे. 1990 के दशक में यहीं से समता पार्टी की शुरुआत जॉर्ज फर्नांडेस ने की थी. पिछले 25 साल से नालंदा नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड की लोकसभा सीट रही है. हालांकि केंद्र में मोदी के आने के बाद से बिहार शरीफ के विधायक भारतीय जनता पार्टी से रहें. 22 जनवरी को जो कुछ भी यहां हुआ लगभग वैसा ही भारत के कई शहरों में हुआ. अगली सुबह अखबारों की सुर्खियां "भारत ने दिवाली मनाई" जैसी खबरों से पटी थीं. इससे बेहतर और बड़ा राम मंदिर के उद्घाटन का उत्सव भारतीय जनता पार्टी के लिए नहीं हो सकता था. यह मंदिर उनके राजनितिक मैनिफेस्टो का हिस्सा पिछले तीन दशक से था. राम मंदिर का सामूहिक उत्सव मनना इस बात का संकेत था कि भारतीय जनता दल भारतीय हिंदू समाज को बड़े पैमाने पर बदलने में कामयाब रही है.

अब इस बदलाव में राजनितिक सत्ता, मीडिया, उद्योगपति और फिल्म इंडस्ट्री की भागीदारी रही यह बात मायने नहीं रखती. मायने रखता है बदला हुआ हिंदू समाज, जो यह तय करेगा कि भारत का अगला निजाम कौन होगा. यह बदला हिंदू समाज धर्मांध, मुसलमानों से नफरत करने वाला, उद्योगपतियों को तारणहार मानने वाला, ब्राह्मणों को मार्ग दर्शक मानने वाला, असमानता का समर्थक, अंधविश्वासी और हिंसक है. ऐसे में अगर इन्हें बदलना है तो यह जरूरी है कि पहले हम यह समझें कि गैर भाजपाई राजनितिक दल क्या कर सकते थे इसे रोकने के लिए क्योंकि इस समाज को ऐसा बनाने में सबसे बड़ी भूमिका बीजेपी की राजनितिक ताकत और मीडिया की रही. बिहार शरीफ में जो हिंदू समाज को बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई उसे समझ कर शायद एक मॉडल तैयार किया जा सकता है जो हिंदू समाज को वापस समान, धर्म निरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, सहिष्णु और अहिंसक बना सकता है. मोदी के केंद्र में आते ही लगभग 20 साल बाद बीजेपी की बिहार शरीफ विधान सभा सीट पर 2015 में वापसी हुई. यह वह समय था जिसे राजनितिक वैज्ञानिक मोदी लहर कहते थे. मोदी लहर का मतलब था एक ऐसी विचारधारा जो मुसलमानों को हिंदुओं का दुश्मन मानती थी, रूढ़िवादी हिंदू धर्म में विश्वास करती थी और पूंजीवाद को देश का निर्माता समझती थी. मोदी के शासनकाल में बिहार शरीफ में जो सबसे बड़ा बदलाव आया: वह था नए मंदिरों का निर्माण और पुराने मंदिरों का विस्तार. शहर में कम से कम आधे दर्जन नए मंदिर खड़े हो गए. उनके आस-पास फूल-मालाओं की दुकानें और बड़े-बड़े साउंड बॉक्स से बजते भजन भी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो गए. पहले जहां शांति हुआ करती थी अब चार महल्ले दूर तक 24 घंटे भजन बजते रहते. पुराने मंदिर जहां नए जोड़े शादी-व्याह के बाद देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेने जाते थे, उसका स्वरूप बदल दिया गया. अब वे और बड़े हो गए, वहां भी लाउडस्पीकर लगा दिए गए. पूजा अर्चना के आलावा इन मंदिरों में कई धार्मिक आयोजन होने लग गए.  ऐसे-ऐसे अनुष्ठान जिसका नाम भी स्थानीय लोगों ने पहले नहीं सुना था. मगर धर्म के नाम सब चलता रहा. न सरकार ने इस बदलाव को देखा और न प्रसाशन ने. ये मंदिर बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा निकाले जाने वाले रामनवमी और अन्य शोभा यात्राओं का संयोजन केंद्र बने. शोभा यात्रा में शामिल होने वाले लड़कों को पानी और नास्ता यही मंदिर कराते.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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