नया नेता, पुराना कलाकार

तमिलनाडु में विजय की जीत के मायने

10 मई, 2026 को सी जोसेफ़ विजय के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जश्न मनाते तमिलगा वेत्री कझगम के कार्यकर्ता. अंशुमन पोयेरकर/एचटी फ़ोटो

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चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के अंदर सभी कैमरों की नज़र उन मंत्रियों, अफ़सरों और फ़िल्मी हस्तियों पर थी जो राज्य के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ़ विजय के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए वहां आए थे. लेकिन एक और चीज़ थी जिसने सभी का ध्यान खींचा. समारोह की शुरुआत वंदे मातरम से हुई, जिसके बाद राष्ट्रगान हुआ. राज्य में भावनात्मक और राजनीतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखने वाला राज्य का गीत तमिल थाई वाझथु बाद में बजाया गया. तमिलनाडु से बाहर के लोगों को यह घटना शायद मामूली लगे. किसी सरकारी कार्यक्रम में राज्य का गीत राजनीतिक इतिहास और भाषाई पहचान का प्रतीक होता है. शपथ ग्रहण के कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर आलोचनाओं की बाढ़ आ गई. तमिलनाडु में कई लोगों के लिए वंदे मातरम बीजेपी की सांस्कृतिक राजनीति से जुड़ा है और कुछ लोग इसे मुस्लिम-विरोधी भावना वाला मानते हैं. इसलिए, लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील परंपराओं के ज़रिए अपनी पहचान बनाने वाले इस राज्य में इसे कभी भी व्यापक स्वीकार्यता नहीं मिली. इस घटना ने विजय की पार्टी के बारे में और राज्य के लिए उनकी जीत से जो बदलाव आता दिख रहा है, उसे लेकर एक सवाल खड़ा कर दिया.

इससे पहले भी राज्य में तमिल सिनेमा से नेता निकले हैं, लेकिन विजय का उदय एम. जी. रामचंद्रन, एम. करुणानिधि और जे. जयललिता से बहुत अलग है. ये नेता पार्टी सिस्टम, भाषणों और विचारधारा पर आधारित आंदोलनों के ज़रिए स्थापित हुए. इस विधानसभा चुनाव में बिना किसी पारंपरिक राजनीतिक विरासत वाली नई पार्टी, तमिलगा वेत्री कझगम, ने द्रविड़ मुनेत्र कझगम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम के द्रविड़ वर्चस्व को कैसे तोड़ा, इसके जवाब का कुछ अंश सोशल मीडिया में मिलता है. विजय सोशल मीडिया के इसी नए दौर का हिस्सा हैं. रील्स, मीम्स, वायरल क्लिप्स और छोटे-छोटे राजनीतिक संदेशों के साथ-साथ उनका करिश्मा और फ़िल्मों से बनी उनकी पहचान ने मिलकर उस चीज़ को बनाने में मदद की, जिसे कई जानकारों ने एल्गोरिदम-आधारित चुनाव बताया है. विजय के सपोर्ट बेस में युवा वोटर मुख्य रूप से शामिल थे, जबकि पुरानी पार्टियां ज़्यादातर पारंपरिक प्रचार तरीकों पर ही निर्भर रहीं. फिर भी, दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों के दबदबे वाले राज्य में उनकी पहली चुनावी जीत एक चौंकाने वाली घटना है.

तीन दशकों से ज़्यादा समय से विजय तमिल घरों के टीवी पर अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं. उनकी फ़िल्में पोंगल पर रिलीज़ होती हैं, सिनेमाघरों में हाउसफ़ुल चलती हैं और टेलीविज़न पर बार-बार दिखाई जाती हैं. कई लोगों के लिए, ख़ासकर कम और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए, वह एक फ़िल्म स्टार से कहीं बढ़कर थे. वह लोगों के बीच एक जाने-पहचाने और अपने जैसे व्यक्ति बन गए, ऐसे व्यक्ति जिनसे कोई भी पार्षद या मुख्यमंत्री के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा आसानी से और भावनात्मक रूप से जुड़ सकता था. एक के बाद एक फ़िल्मों में उन्हें एक ऐसे ईमानदार इंसान के तौर पर दिखाया गया, जो भ्रष्टाचार से लड़ता है, महिलाओं का सम्मान करता है, गरीबों की रक्षा करता है और सत्ता को चुनौती देता है. समय के साथ, एक्टर, किरदार और राजनीतिक नेता के बीच का फ़र्क धुंधला होने लगा. सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया.

यह लंबे समय से चली आ रही उन राजनीतिक परंपराओं से एक बड़ा बदलाव था जिन्होंने तमिलनाडु को आकार दिया था. राज्य की राजनीति मज़बूत वैचारिक प्रतिबद्धताओं, सार्वजनिक बहस और सामाजिक आंदोलनों के ज़रिए बनी थी. इन आंदोलनों का मक़सद सिर्फ़ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाना था.

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