घुमंतू समाज से सरकारी विश्वासघात के 70 साल

22 जुलाई 2020
2019 के बजट में केंद्र सरकार ने घुमंतू समाज के लिए एक नया आयोग और राज्यों में घुमंतू बोर्ड बनाने की घोषणा की और नीति आयोग के मातहत घुमंतू समुदायों के उत्थान हेतु एक पद सृजित कर उसका अध्यक्ष भीखूराम इदाते को बना दिया. लेकिन आज तक ना नीति आयोग ने कुछ किया और ना इदाते ने.
फोटो : अश्वनी शर्मा
2019 के बजट में केंद्र सरकार ने घुमंतू समाज के लिए एक नया आयोग और राज्यों में घुमंतू बोर्ड बनाने की घोषणा की और नीति आयोग के मातहत घुमंतू समुदायों के उत्थान हेतु एक पद सृजित कर उसका अध्यक्ष भीखूराम इदाते को बना दिया. लेकिन आज तक ना नीति आयोग ने कुछ किया और ना इदाते ने.
फोटो : अश्वनी शर्मा

हिंदुस्तान में घुमंतू समुदायों की आबादी लगभग 10 फीसदी है यानी 13 करोड़ से अधिक, लेकिन पिछले 70 सालों में सरकारों की नीतिगत शून्यता और संस्थागत विफलता ने इस समाज की परेशानियों को चरम पर पहुंचा दिया है. इस रिपोर्ट के पहले हिस्से में मैंने जारी कोरोना लॉकडाउन का भारत के अलग-अलग हिस्सों के घुमंतू समुदायों पर पड़ रहे असर के बारे में लिखा था. लेकिन उनकी हालत सिर्फ लॉकडाउन के चलते खराब नहीं हुई है बल्कि उनकी स्थिति में गिरावाट दशकों से जारी है जिसके चलते यह समाज हर मामलों में भारत के अन्य समुदायों से बहुत ज्यादा पिछड़ गया है. इस समाज की अवहेलना के लिए एक या दो सरकारें नहीं बल्कि आजाद भारत की तमाम सरकारें दोषी हैं.

ब्रिटिश सरकार ने 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम बनाया था जिसके तहत घुमंतू समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था. इनके पारंपरिक कामों पर रोक लगा दी गई थी और इनकी स्वतंत्र चहलकदमी को प्रतिबंधित कर दिया गया था. होता यह था कि इन्हें नजदीक थानों में जाकर हाजिरी लगानी पड़ती थी.

भारत को 1947 में आजादी मिली किंतु घुमंतू समुदायों को 31 अगस्त 1952 को इस कानून से मुक्त किया गया. लेकिन मुख्य भारत से पांच साल की देरी से मिली आजादी भी झूठी निकली. भारत सरकार ने इनके सर दूसरा अधिनियम बांध दिया यानी अभ्यस्त अपराधकर्ता अधिनियम, जो पहले वाले कानून से थोड़ा हल्का है लेकिन अंग्रेजो वाले भेदभाव को जारी रखता है. यह कानून आज तक लागू है. भारत सरकार ने 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम पारित किया जिसके बाद सांप पकड़ने, भालू और बंदर का खेल दिखाने तथा जोंक रखने पर रोक लगा दी गई. जंगल की बाड़बंधी कर दी गई और जंगल के अंदर प्रवेश करने पर रोक लग गई. मेडिकल प्रैक्टिशनर अधिनियम, क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट कानून, ड्रग एंड कॉस्मेटिक कानून और अन्य कानून इनके जड़ी बूटियों के प्रयोग तथा चिकित्सा के इनके परंपरागत तरीकों को अवैध बनाते हैं. 1982 में नट के रस्सी पर करतब दिखलाने पर रोक लगा दी गई. 1995 में बंजारों को नमक बेचने से रोक दिया गया.

2005 में यूपीए सरकार ने रैनके आयोग का गठन किया था जिसके अध्यक्ष बालकृष्ण रैनके थे. इस आयोग का कार्य घुमंतू समुदायों की स्थिति का पता लगाना और उनके उत्थान हेतु सुझाव देना था. इस आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को सौंपी. 2009 से लेकर 2014 तक केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन या यूपीए की सरकार थी लेकिन उस रिपोर्ट को संसद के पटल पर बहस के लिए नहीं रखा गया. 2014 में केंद्र में सरकार बदल गई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या एनडीए की सरकार बनी. नई सरकार ने जनवरी 2015 में भीखूराम इदाते की अध्यक्षता में एक नए आयोग का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट 2019 में सौंप दी. इदाते आयोग ने अपनी रिपोर्ट का आधार रैनके आयोग की रिपोर्ट को बनाया था लेकिन दोनों आयोग सरकारी समय और संसाधन की बर्बादी साबित हुए.

घुमंतुओं के पास शमशान भूमि नहीं होती इसलिए ये लोग जहां होते हैं वहां की शमशान भूमि में अपने मृतकों को दफनाते हैं लेकिन गांव वाले अक्सर उन्हें अंतिम संस्कार करने नहीं देते जिसके चलते ये लोग मृत देह को लेकर इधर से उधर घुमते रहते हैं.

अश्वनी शर्मा स्कॉलर एवं एक्टिविस्ट हैं और घुमंतू समुदायों के साथ काम करने वाली सामाजिक संस्था नई दिशाएं के संयोजक हैं और हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में पीएचडी हेतु रामचंद्र गुहा और शेखर पाठक के रेफरल स्टूडेंट हैं.

Keywords: nomadic nomad Ashok Gehlot Vasundhara Raje United Progressive Alliance (UPA) National democratic alliance
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