राफेल करार पर भारतीय वार्ता दल की 10 आपत्तियां

राफेल खरीद के लिए गठित भारतीय वार्ता दल के तीन सदस्यों ने करार के विभिन्न पहलुओं पर अपनी विसम्मति पेश की थी. सुप्रीम कोर्ट को दिए जवाब में सरकार ने सदस्यों की आपत्तियों का उल्लेख नहीं किया.
क्रिस्टोफर साइमन/एएफपी/गैटी इमेजिस
राफेल खरीद के लिए गठित भारतीय वार्ता दल के तीन सदस्यों ने करार के विभिन्न पहलुओं पर अपनी विसम्मति पेश की थी. सुप्रीम कोर्ट को दिए जवाब में सरकार ने सदस्यों की आपत्तियों का उल्लेख नहीं किया.
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कारवां के पास उपलब्ध जानकारियों से पता चलता है कि 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए फ्रांसीसी पक्ष से वार्ता कर रही 7 सदस्यीय भारतीय टीम के सदस्य करार के कई पक्षों पर आपस में सहमत नहीं थे और टीम के कई सदस्यों का मानना था कि करार में ऐसे प्रावधान हैं जो भारतीय हितों के खिलाफ हैं. सुप्रीम कोर्ट में राफेल खरीद प्रक्रिया का बचाव करते हुए सरकार ने इस असहमति की बात छिपाई और दावा किया कि वार्ता टीम ने “आदर्श प्रक्रिया का पालन किया”.

कारवां में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि विवाद का एक कारण करार की कीमत था. 36 लड़ाकू विमान की आरंभिक बेंचमार्क कीमत 5 अरब 20 करोड़ यूरो थी जो 2016 के करार की कीमत से 2 अरब 50 करोड़ यूरो कम थी. आरंभिक कीमत की गणना मूल्य निर्धारण करने वाली टीम के सदस्य एमपी सिंह ने की थी. टीम के दो सदस्य- वायुसेना के खरीद प्रबंधक और संयुक्त सचिव राजीव वर्मा और वायुसेना के ही वित्त प्रबंधक अनिल सूले ने, एमपी सिंह की गणना का समर्थन किया था. टीम के 7 सदस्यों में सिंह, वर्मा और सूले ही मूल्य संबंधी मामलों के जानकार थे. दल के चार सदस्यों ने आरंभ में कीमत को अपर्याप्त बता कर विरोध किया था. विरोध करने वाले सदस्यों में वायुसेना उपप्रमुख राकेश कुमार सिंह भदौरिया भी शामिल थे. मूल्य से संबंधित विषय को रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) और रक्षा हितों से संबंधित तकनीकी सुझावों के लिए उपयुक्त प्राधिकरण को भेज दिया गया. मनोहर पर्रिकर की अध्यक्षता वाली डीएसी ने रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के विपरीत वैकल्पिक गणना का प्रस्ताव दिया. राफेल करार की गणना 2013 की प्रक्रिया के तहत आती है. डीएसी ने कीमत के संबंध में अंतिम निर्णय करने के लिए संशोधित मूल्य को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी के पास भेज दिया. नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमिटी ने इस कीमत पर मुहर लगा दी जबकि उसके पास मूल्य जैसे तकनीकी मामलों पर विचार करने की विशेषज्ञता नहीं थी.

ऐसा ही हुआ अन्य आंतरिक विवादों के मामले में. सिंह, वर्मा और सूले ने विरोध के कई पक्ष सामने रखे जिनका विरोध भदौरिया और दल के अन्य सदस्यों ने किया. विवाद के मुद्दों को डीएसी के पास भेजा गया जिसने कई बिंदुओं को खारिज कर दिया और कुछ को कैबिनेट कमिटी के पास भेज दिया. कैबिनेट कमिटी ने वार्ता कर रहे अधिकारियों के विरोध के बावजूद राफेल करार को मंजूरी दे दी.

वार्ता दल के विसम्मत सदस्यों द्वारा उठाए गई आपत्तियां इस प्रकार हैं-

1. “अंतिम बेंचमार्क कीमत 7 अरब 89 करोड़ यूरो पहले की बेंचमार्क कीमत 5 अरब 20 करोड़ यूरो से बहुत ज्यादा है इसलिए नई कीमत की तार्किकता पर सवाल उठता है”.

हरतोष सिंह बल द कैरवैन के राजनीतिक संपादक और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

सुरभि कॉंगा द कैरवैन की वेब एडिटर हैं.

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