कार्यकारी (और) संपादक

मीडिया का सरकार का अंग बन जाना

06 जनवरी 2021

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जैसे ही यह स्पष्ट हो गया कि डोनाल्ड ट्रंप सत्ता से बाहर हो गए हैं और जो बाइडन अमेरिका के नए राष्ट्रपति होंगे, अनंत गोयनका ने एक ट्वीट किया :

मैं आशा करता हूं कि बाइडन की जीत के बाद अमेरिकी समाचार मीडिया अपने पक्षपातपूर्ण तरीके के बारे में आत्मावलोकन करेगा. वह केवल अपने प्रति वफादारों और ईको-कक्ष समुदाय के पाठकों के बजाय अवश्य ही सकल आबादी के विचारों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा.

जाहिर तौर पर यह गोयनका के पसंदीदा विषयों में से एक है. पत्रकार शोमा चौधरी को दिए एक हालिया इंटरव्यू में एक्सप्रेस ग्रुप के कार्यकारी निदेशक और वारिस गोयनका ने “एक निश्चित सरोकार, एक निश्चित भूमिका जो परिभाषित करे कि हम यह क्यों कर रहे हैं, मीडिया के इस पेशे में क्यों हैं,” की जरूरतों पर बातचीत की. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की इमरजेंसी काल से चली आ रही विरासत का उल्लेख किया, जब इस अखबार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अधिनायकवादी रवैये की मुखालफत की थी. फिर उन्होंने उस अंधेरे कालखंड द्वारा परिभाषित किए गए लक्ष्यों के बारे में कहा, “तब मुनाफे से कहीं ज्यादा बड़ा मकसद होता था : निरंकुशता को चुनौती देना, अबाध अभिव्यक्ति और लोकतंत्र की रक्षा करना.”

लेकिन इमरजेंसी के बाद एक दूसरी सरकार के अपनी मौज-तरंग में आकर अपने से असंतुष्टों को जेल में डाले जाने के बावजूद गोयनका ने आज के मीडिया के लिए उन्हीं लक्ष्यों का उल्लेख नहीं किया. इसके बजाय उन्होंने महसूस किया कि वर्तमान की त्रासदी की वजह देश में अतिवादी विचारों का ध्रुवीकरण है. गोयनका ने कहा, “आज पत्रकारिता की एकदम सटीक भूमिका उस सामान्य धरातल की खोज और उसके लिए प्रयत्न में अधिक समय लगाने का है, जो कम ध्रुवीकरण करे, एक या दूसरे अतिवादों के बारे में महज जुगाली करने के बजाए समाज को कम से कम विभाजित करे.”

हरतोष सिंह बल कारवां के राजनीतिक संपादक और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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