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महेंद्र सिंह राठौड़ कई सालों से राजस्थान चुनाव में टिकट की गुहार भारतीय जनता पार्टी से लगा रहे थे और इस साल उनका सितारा चमक गया. पार्टी की कोर कमेटी ने उन्हें जोधपुर जिले की सरदारपुरा सीट का टिकट दे दिया. यह राजस्थान की एक प्रमुख सीट है, जहां 25 नवंबर को मतदान हुए. राठौड़ मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ मैदान में हैं. 1998 में सरदारपुरा उपचुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक गहलोत लगातार छठी बार इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. गहलोत ने यह सीट अब तक नहीं हारी है.
राठौड़ जोधपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रह चुके हैं और जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. मैं जब उनसे मिली, वह सरदारपुरा में रावणा राजपूत समाज की एक सभा में भाषण देकर मंच से नीचे उतरे ही थे. इस सभा में रावणा राजपूत समुदाय के ढाई सौ से ज्यादा सदस्य उपस्थित थे. अपने संबोधन में, उन्होंने दावा किया कि गहलोत सरकार ने कुछ समुदायों को "रूह अफ़ज़ा" पिलाया है. यह मुसलमानों पर तंज था और कांग्रेस सरकार की नीतियों को तुष्टिकरण के रूप में चित्रित करने की एक साफ़ कोशिश भी. "हमें नज़रअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि हम सनातन धर्मी हैं," उन्होंने दावा किया.
मैंने उनसे पूछा कि इस सीट के लिए वह क्यों उपयुक्त उम्मीदवार हैं तो उन्होंने मुझसे कहा, ''मैं संगठन का आदमी हूं, कैडर हूं.'' उन्होंने कहा कि इस बार उन्होंने टिकट नहीं मांगा है. जब तक कि पार्टी की तीसरी सूची में राठौड़ का नाम नहीं आ गया, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के इस सीट पर बीजेपी का उम्मीदवार होने की अफवाह थी. 2019 के आम चुनाव में शेखावत ने जोधपुर संसदीय सीट पर गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को 2.79 लाख वोटों से हराया था. मैंने राठौड़ से पूछा कि शेखावत को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया. “गजेंद्र सिंह शेखावत राज्य के नेता हैं. वह राज्य के विभिन्न हिस्सों में जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के बारे में बात कर रहे हैं,'' राठौड़ ने मुझे बताया. “बीजेपी एकजुट होकर चुनाव लड़ रही है.”
राठौड़ के समर्थक और कांग्रेस कार्यकर्ता दोनों ही राठौड़ को एक सर्वोत्कृष्ट राजनेता के रूप में नहीं देखते. उनके लिए मैंने "कार्यकर्ता" और "संगठन से जुड़ा आदमी" जैसे शब्द सुने. मैंने जिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बात की, उन्होंने राठौड़ को बलि का बकरा उम्मीदवार बताया. जोधपुर में गहलोत की चुनावी रणनीति के प्रभारी रमेश बोराणा ने कहा, "किसी को तो शहीद होना पड़ेगा. बीजेपी को हारने के लिए किसी को भेजना पड़ा, क्योंकि कोई भी लड़ने के लिए तैयार नहीं था." उन्होंने कहा, ''मैं राठौड़ को जानता हूं, वह एक अच्छे इंसान हैं. वह प्रोफेसर हैं, राजनेता नहीं. उनकी विचारधारा संघ-बीजेपी के अनुरूप है और वे ऐसे ही हैं.''