अकाली दल का एनडीए से अलग होने का फैसला राजनीति से प्रेरित, सिख मुद्दों से नहीं है लेनादेना

08 अक्टूबर 2020
5 मार्च 1998 को नई दिल्ली में आयोजित एक बैठक शुरू होने से पहले भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल समर्थकों के साथ बैठक में.
पीटीआई
5 मार्च 1998 को नई दिल्ली में आयोजित एक बैठक शुरू होने से पहले भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल समर्थकों के साथ बैठक में.
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26 सितंबर को शिरोमणि अकाली दल ने घोषणा की कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग हो रही है. इस तरह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के साथ उसकी 24 साल की लंबी साझेदारी खत्म हो गई. कृषि उपज की खरीद और बिक्री से संबंधिक तीन विवादास्पद अध्यादेशों को कानून बना देने के केंद्र सरकार के फैसले के चलते अकाली दल गठबंधन से अलग हो गई. अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने ट्वीट कर दावा किया कि अलग होने का कारण केंद्र की “एमएसपी पर फसलों के सुनिश्चित विपणन की रक्षा के लिए वैधानिक विधायी गारंटी देने से इनकार करना और पंजाबी और सिख मुद्दों के प्रति केंद्र सरकार की असंवेदनशीलता है.” बादल यह स्पष्टीकरण चलाकी और राजनीति से प्रेरित लगता है.

पिछले पांच दशकों में संघ परिवार ने कई मौकों पर सिखों के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाई है. फिर भी अकाली दल ने बीजेपी और उससे पहले भारतीय जनसंघ के साथ चुनावी संबंध बनाए रखा. हाल के सालों में अकाली दल को पंजाब के भीतर आलोचना का सामना करना पड़ा है. बीजेपी के साथ पार्टी के इतिहास से पता चलता है कि एनडीए के साथ संबंध विच्छेद करने का उसका फैसला सिख मुद्दों को ​लेकर उसकी प्रतिबद्धता के बजाय हिंदू बहुसंख्यवादी पार्टी के साथ जुड़ने से होने वाले नुकसान को ध्यान में रखा कर किया गया है.

1996 में बीजेपी के साथ गठबंधन करने से पहले अकाली दल कई बार जनसंघ के साथ आई. 1967 में अकाली दल, जनसंघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के गठबंधन से पंजाब में पहली बार कोई गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनाया. एक दशक बाद जनसंघ के साथ फिर से गठबंधन करके अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल को मुख्यमंत्री बनवाया.

अगले 15 साल राज्य उग्रवाद की चपेट में रहा और बीजेपी वालों ने सिखों के खिलाफ कई अपराध किए. इनमें से सबसे जघन्य अपराध इंदिरा गांधी सरकार के दौरान अमृतसर में स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों का सफाया करने के लिए चलाए सैन्य अभियान, ऑपरेशन ब्लू स्टार, से महीनों पहले 1984 में बीजेपी के एक पूर्व विधायक ने किया था. 1996 में इस घटना का विवरण देश भर के गुरुद्वारों का प्रबंधन करने वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने अपने “पंजाब का सच” श्वेत पत्र में किया था. इसमें उल्लेख है कि राष्ट्रीय हिंदू सुरक्षा समिति नामक एक समूह ने फरवरी 1984 में बंद का आयोजन किया था. पत्र उल्लेख करता है,

14 फरवरी 1984 को समिति द्वारा भारत बंद के आह्वान के बाद अमृतसर में 56 स्थानों पर भीड़ ने इकट्ठा होकर सिख गुरुओं, सिख धर्म और उनके धार्मिक संस्थानों की पवित्रता को दूषित किया. अमृतसर रेलवे स्टेशन पर दरबार साहिब की एक रेप्लिका (प्रतिकृति) के टुकड़े—टुकड़े कर दिए गए. कई सालों से प्रदर्शनी के लिए रखी चौथे सिख गुरु राम दास की एक तस्वीर को इतना क्षतिग्रस्त कर दिया कि उसे पहचाना भी न जा सके और उसमें एक जलती हुई सिगरेट रगड़ दी. तस्वीर पर मल और पेशाब करना भीड़ द्वारा पवित्रता को बेहद दूषित करने वाला, उत्तेजक कार्य था. ऐसा करने वाली भीड़ का नेतृत्व पूर्व विधायक और बीजेपी के जिला अध्यक्ष हरबंस लाल खन्ना ने किया.

जतिंदर कौर तुर वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले दो दशकों से इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और डेक्कन क्रॉनिकल सहित विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों में लिख रही हैं.

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