जब मायावती ने राजनीति के लिए छोड़ा घर

06 फ़रवरी 2019
मायावती का अपने गुरु कांशीराम के साथ बेहद करीबी रिश्ता था. फिर भी सफल नेता बनने के लिए मायावती को अपने गुरु के साथ संघर्ष करना पड़ा.
रवि बत्रा/इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव
मायावती का अपने गुरु कांशीराम के साथ बेहद करीबी रिश्ता था. फिर भी सफल नेता बनने के लिए मायावती को अपने गुरु के साथ संघर्ष करना पड़ा.
रवि बत्रा/इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव

1977 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में जातिवादी व्यवस्था की बुराइयों पर आयोजित एक कार्यक्रम में 21 वर्षीय मायावती के जोरदार भाषण ने कांशीराम का ध्यान उनकी ओर खींचा. उस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जनता दल के नेता राज नारायण थे जिन्होंने आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली से इंदिरा गांधी को हराया था. कार्यक्रम में राज नारायण बार बार दलितों को “हरिजन” कह कर संबोधित कर रहे थे. यह शब्द मोहनदास गांधी का दिया हुआ है और दलित इस शब्द से बेहद नफरत करते हैं. जब मायावती की बारी आई तो उन्होंने माइक्रोफोन पकड़ा और राज नारायण पर आरोप लगाया कि उन्होंने पूरी दलित जाति का अपमान किया है. अपनी जीवनी में वह याद करती हैं, ‘‘क्या हरिजन जातिवाचक शब्द नहीं है?’’ मुझे लगता है जाति की रुकावटों को खत्म करने के लिए हो रहा यह सम्मेलन अनुसूचित जाति के लोगों को गुमराह कर रहा है.’’ उनकी किताब के अनुसार जब उनका भाषण खत्म हुआ तो लोग उनके समर्थन में नारे लगाने लगे. वह कह रहे थे, ‘‘राज नारायण मुर्दाबाद, जनता पार्टी मुर्दाबाद’’ और ‘‘डा. अंबेडकर जिंदाबाद’’.

जब मायावती के जोरदार भाषण की बात कांशीराम तक पहुंची तो वह बहुत चकित हो गए. अंबेडकरवादी समूहों में जब आज भी बहुत कम महिलाएं नेतृत्वकारी भूमिका में हैं तो चार दशक पहले 21 साल की, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला, जो अपनी दलित पहचान के प्रति राजनीतिक रूप से जागरुक और आक्रमक है, किसी ने शायद ही पहले सुना और देखा था. इसके कुछ दिनों बाद कांशीराम एक दिन बिना बताए मायावती के घर पहुंच गए. बातचीत के दौरान उन्होंने मायावती से कहा कि यदि वह जातीय उत्पीड़न से लड़ना चाहती हैं तो प्रशासनिक सेवा से ज्यादा ताकत राजनीतिक सत्ता से मिलेगी. उन्होंने मायावती को इस बात के लिए मनाया कि यदि वह उनके मिशन से जुड़ जाती हैं तो उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने का उनका सपना पूरा हो सकता है. कांशीराम ‘‘मिशन’’ शब्द को अक्सर इस्तेमाल करते थे. आज भी बसपा कार्यकर्ता अपने काम को इसी शब्द से परिभाषित करते हैं.

मायावती-कांशीराम संबंध की कहानी गुरु-शिष्य संबंधों के साथ ही उन संबंधों की बेड़ियों को तोड़कर शिष्या का अपने गुरु से सफल राजनीतिज्ञ बनने की कथा भी है. मायावती जो कर सकीं उसके लिए उन्हें असंख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

अपनी बेटी की राजनीतिक संलग्नता और कांशीराम के साथ बढ़ती नजदीकियों से चिंतित, पिता ने मायावती को यह कह कर चेतावनी दी कि उन्हें पार्टी या घर में से किसी एक को चुनना होगा. उनके पिता का कहना था कि वह एक अविवाहित महिला हैं इसलिए उनके पास पिता की बात मानने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है. बेखौफ मायावती ने स्कूल टीचर की नौकरी से बचाए पैसों के साथ पिता का घर छोड़ दिया और दिल्ली के करोलबाग में बामसेफ के दफ्तर के बगल में कांशीराम के एक कमरे वाले घर में रहने लगीं. बसपा के पुराने नेता और पत्रकार शाहिद सिद्दकी ने मुझे बताया, ‘‘यह एक बड़ा लेकिन दृढ़ कदम था. कौन सी पार्टी थी जो मायावती के इंतजार में बैठी थी. वह कोई इंदिरा गांधी नहीं थीं कि ताज लेकर लोग इंतजार कर रहे थे. वह जयललिता नहीं थी जिन्होंने एआइएडीएमके की स्थापना के 10 साल बाद पार्टी में प्रवेश किया था. वो ममता बनर्जी भी नहीं थी जो लंबे समय तक कांग्रेस कार्यकर्ता रहीं और बाद में दूसरे बागियों के साथ पार्टी से अलग हो कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. सिद्दकी कहते हैं, ‘‘मायावती ने खतरा उठाया और पार्टी को खड़ा करने के लिए जी जान एक कर दिया.’’

जब कांशीराम अपने स्वागत कक्ष में ताकतवर और प्रभावशाली लोगों के साथ बैठकें कर रहे होते तो मायावती आंगन में दरी बिछा कर ग्रामीण इलाकों से आए दलित पुरुषों को पार्टी में शामिल कर रही होतीं.

नेहा दीक्षित स्वतंत्र पत्रकार हैं और दक्षिण एशिया की राजनीति एंव सामाजिक न्याय विषयों पर लिखती हैं.

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